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आवश्यकता From 21 Apr 2018

एक संत अपना आश्रम बनाने के लिए धन संघ्रह कर रहे थे. एक गांव में थके हारे संत ने एक कुटिया का दरवाज़ा खटखटाया, एक छोटी बच्ची ने उन्हें प्रणाम किया, खाना दिया और रात्रि को शयन के लिए एक खटिया लगाकर, खुद नीचे ज़मीन पर सोगयी. खटिया की आदत ना होने से संत को रात भर नींद नहीं आयी पर वो बच्ची खटोर धरा अपर चैन  की नींद सोरही थी. सुबह संत ने उससे पूछा तुम्हे इतनी चैन की नींद कैसे आयी और सदैव तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान कैसे है? बच्ची ने उन्हें बताया," वे सदैव सत्कर्म करती हैं और परमात्मा को सभी के लिए धन्यवाद करती हैं और जब रात को सोती हैं तो लगता है जैसे धरती माँ के आँचल में सोरही है." वे प्रयास करती हैं की वे सत्कर्म करती रहे. संत से कहती हैं," आप आश्रम के लिए धन इक्क़ठा कर रहे हैं, मैं भी मदद कर सकती हूँ?" संत मुस्कुराकर कहते हैं, "अब मुझे आश्रम की कोई ज़रूरत नहीं."

जैसे जैसे हमारी आवश्यकता बढ़ती हैं, वैसे वैसे हमारा जीवन पीड़ा में व्यतीत होने लगता है." जितना पैसा आएगा, उतना तनाव और भय बढ़ेगा.

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