Please wait !

Text Speeches

21
Apr, 2018
21
Apr, 2018
TEXT SPEECHES

एक बड़े संत एक प्रवचन कर रहे थे और उनके सामने एक व्यक्ति सो रहे थे. संत ने उन्हें देख कर पूछा, "भैया सो रहे हो?” वो बोले," नहीं नहीं महाराज, मैं कहाँ सो रहा हूँ, मैं तो जागा हुआ हूँ. थोड़ी देर बाद फिर नींद आयी तो फिरसे पूछा, "भैया जीवित हो?" बोले, "नहीं नहीं महाराज, मैं कहाँ जीवित  हूँ। सोते हुए आदमी को जगाना आसान है, परन्तु जागते हुए आदमी को जगाना मुश्किल. हम सब लोग जाग रहे हैं लेकिन हम जागते हुए  सो रहे हैं. रोज़ मंदिर जाना, पूजा अर्चना करना, एक नित्य कर्म है. एक आदत है.. उसमे भाव नहीं हैं, उसमे परमात्मा के प्रति भक्ति गायब हो चुकी है. ये सब इसलिए क्योंकि  हम ये सब काम बेहोशी में कर रहे हैं. अपने दफ्तर तक पहुँचने के लिए व्यक्ति वाहन उठाता है और पहुंच जाता है. उसे रस्ते याद होते है और उस समय उसके भीतर कही ख्याल चल रहे होते हैं. आपको हर समय पता होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं. यदि आप होश में रहना सीख गए तोह आप दुनिया के सबसे सफल आदमी होजाओगे क्योंकि होश में व्यक्ति एक समय पर एक काम करता है और हम सब एक समय पर ४ काम करने के आदी हो चुके हैं.

एक सेठ थे जो गुड़ बाटने गाँव में गए. उनकी मुलाकात एक बच्ची से हुई जिसने गुड़ लेने से मन करदिया. सेठ ने उससे पूछा कि क्यों नहीं चाहिए? बच्ची मुस्कुराते हुए बोलने लग, "मेरी माताजी ने सिखाया है कि कोई भी चीज़ मुफ्त में नहीं लेनी चाहिए।" सेठ ने तुरंत माताजी से मिलने की इच्छा व्यक्त की. बच्ची सेठजी को अपने घर लेजाती हैं, एक टूटी सी झोपड़ी हैं जहां उनकी माताजी खाना बना रही होती हैं. सेठजी माताजी से पूछते हैं, "तुमने अपनी बेटी को ये सीख दी है कि मुफ्त में कोई चीज़ मिले तो नहीं लेनी चाहिए?" एक चमक से बोल पड़ी, "हाँ साहब मैंने सिखाया है." जब पूछा कि रोज़ी रोटी कैसे कमाती हैं? तोह उन्होंने बताया, लकड़ियाँ काटकर बेचकर पैसे कमाती हैं वह. सेठ ने उनके पति के लिए पूछा, माताजी ने बताया कि उनके पति का कई वर्ष पहले स्वर्गवास होगया था. सेठजी ने फिर पूछा कि "क्या हुआ उस संपत्ति का जो तुम्हारा पति पीछे छोड़कर गया?"  औरत ने बहुत  ही सरल जवाब दिया, "मैं अपंग या असहाय नहीं हूँ. मैंने वो ज़मीन और बैल बेचकर जो पैसा मिला, गांव की उन्नति के लिए दे दिया और अब लकड़ियां बेचकर अपना घर चला रही हूँ." सेठजी को जीवन की वात्सविकता समझ आ गई।

संस्थान में एक पद के साक्षात्कार के लिए जब कई लोग कार्यालय आए, वक़्त गुजरने के बाद एक व्यक्ति अपनी   के साथ आये. उनसे पूछा गया की वे समय पर क्यों नहीं आए तो उन्होंने बताया कि, "रस्ते में उन्हें एक दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति मिल गए जिन्हे वे अस्पताल लेगए और दवाइयां लेकर दी. उन्होंने साक्षात्कार से ज़्यादा एक पीड़ित को प्राथमिकता दी. इसका ये मतलब नहीं कि उन्हें नौकरी की ज़रूरत नहीं, पर उनके लिए क्या ज़्यादा ज़रूरी था. उस व्यक्ति को नौकरी मिल गयी क्योंकि उसने उस पीड़ित को बचाने के लिए नौकरी की चिंता नहीं की. जो औरो के लिए सोचता और जीता है, उसके जीवन में सभी कार्य श्रेष्ठ होते हैं. उसको उतने कष्टों से नहीं गुज़रना पड़ता जितना एक स्वार्थी व्यक्ति को गुज़रना पड़ता है.

21
Apr, 2018
21
Apr, 2018
TEXT SPEECHES

एक अँधा व्यक्ति कुएं से पानी निकाल रहा था. तभी राजा ने अपने सैनिक को भेजा कि प्यास लगी है, पानी ले आओ. सैनिक ने अंधे को कहा, "ए अंधे! राजा के लिए पानी चाहिए, पानी दे." उसने कहा," तू सैनिक है सैनिक ही रहेगा, नहीं दूंगा पानी।" फिर महामंत्री को भेजा. महामंत्री ने बोला,"सूरदास बाबा, पानी चाहिए पानी देगा क्या?" उसने कहा,"तू महामंत्री से आगे कभी नहीं बढ़ पाएगा." राजा आया राजे ने कहा,"बाबाजी गाला सूख रहा है  ,पानी  देंगे तो बड़ी कृपा होगी." उस अंधे व्यक्ति ने राजन को बड़े प्रेम से पानी पिलाया। राजा ने पूछा,"आपने कैसे अंतर जाना कौन सैनिक, कौन महामंत्री और कौन राजा है, आप तो देख नहीं सकते." उसने कहा,"मैंने भाषा से समझा." शब्दों से मुझे विदित हुआ कि कौन छोटा है और कौन बड़ा. शब्दों का चयन ढंग से करना ज़रूरी है पर शब्दों का चयन स्वयं पर कम होना चाहिए. जिस तरह प्रकृति किसी चीज़ में भेद भाव नहीं करती उस तरह इंसान को भी नहीं करना चाहिए.

21
Apr, 2018
21
Apr, 2018
TEXT SPEECHES

एक संत अपना आश्रम बनाने के लिए धन संघ्रह कर रहे थे. एक गांव में थके हारे संत ने एक कुटिया का दरवाज़ा खटखटाया, एक छोटी बच्ची ने उन्हें प्रणाम किया, खाना दिया और रात्रि को शयन के लिए एक खटिया लगाकर, खुद नीचे ज़मीन पर सोगयी. खटिया की आदत ना होने से संत को रात भर नींद नहीं आयी पर वो बच्ची खटोर धरा अपर चैन  की नींद सोरही थी. सुबह संत ने उससे पूछा तुम्हे इतनी चैन की नींद कैसे आयी और सदैव तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान कैसे है? बच्ची ने उन्हें बताया," वे सदैव सत्कर्म करती हैं और परमात्मा को सभी के लिए धन्यवाद करती हैं और जब रात को सोती हैं तो लगता है जैसे धरती माँ के आँचल में सोरही है." वे प्रयास करती हैं की वे सत्कर्म करती रहे. संत से कहती हैं," आप आश्रम के लिए धन इक्क़ठा कर रहे हैं, मैं भी मदद कर सकती हूँ?" संत मुस्कुराकर कहते हैं, "अब मुझे आश्रम की कोई ज़रूरत नहीं."

जैसे जैसे हमारी आवश्यकता बढ़ती हैं, वैसे वैसे हमारा जीवन पीड़ा में व्यतीत होने लगता है." जितना पैसा आएगा, उतना तनाव और भय बढ़ेगा.